सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

सठिया गए हैं पवार !

पवार की ठाकरे से मुलाक़ात पर अब सियासत होने लगी है कोई नई बात नहीं है हम रोज़ ही देखते हैं... मैने कल भी लिखा था कि क्या है इस मुलाक़ात के पीछे... वाकई आख़िर पवार चाहते क्या हैं... क्या हो गया है उन्हें... महंगाई को लेकर लगातार विपक्ष और मीडिया के निशाने पर रहने के कारण क्या उनका दिमाग़ फिर गया है या फिर उन्हें सुर्ख़ियों में रहना पसंद है... याद रहे ये वही शरद पवार है जो कभी कांग्रेस में एक अच्छा मुक़ाम रखते थे... लेकिन सोनिया गांधी का विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर 1999 में इन्होने कांग्रेस से किनारा कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया था... लेकिन कहते हैं ना कि राजनीति में सब कुछ जायज़ है और पवार ने जब कांग्रेस के पास पावर देखा तो फिर से कांग्रेस के नज़दीक आ गए... पिछली लोकसभा में मंत्री थे... इस बार भी मंत्री है अपने पसंदीदा मंत्रालय में बैठे हैं लेकिन सवाल अब भी वही है कि ऐसा क्यों...? दरअसल इसके पीछे ये तथ्य हो सकता है, शरद पवार का जन्म हुआ था 12 दिसंबर 1940 को ... यानि की शरद पवार 60 साल पार चुके हैं... जब वो 60 की दहलीज़ पर थे तब सठियाए थे, उन्होने कांग्रेस छोड़ने का एक बड़ा क़दम उठाया था... और एनसीपी का गठन किया था... अब 70 के करीब हैं यानि की ये साठ के दशक से अब सत्तर के दशक में प्रवेश कर रहे हैं... और ऐसे में उन्होने बाल ठाकरे से मुलाक़ात की सुरक्षा को लेकर जबकि वो ख़ुद सरकार के नुमाइंदे हैं... एक बड़े पद पर बैठे हैं... और केंद्रीय गृहमंत्री पी चिंदबरम सुरक्षा की गारंटी दे चुके हैं ऐसे में उन्होने ये मुलाकात की है... अब इसे क्या कहा जाए... सच ही तो है पवार सठिया गए हैं...

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

एक मुलाक़ात ज़रूरी है ?

मैं ऑफिस में बैठा था कि अचानक एक ख़बर फ्लैश हुई... ब्रेकिंग न्यूज़ पवार मिलेंगे बाल ठाकरे से... पहला ख़्याल आया कि महंगाई से परेशान पवार हो सकता है कि अब मंत्र लेने जा रहे हों ठाकरे से मंहगाई पर क़ाबू पाने के लिए... लेकिन वक्त गुज़रने के साथ साथ कुछ-कुछ साफ़ होने लगा... चार दीवारी के भीतर क्या कुछ हुआ ये तो चारों ही जानते सकते हैं शरद पवार, शशांक मनहर, बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे... लेकिन सवाल ये है कि पवार मातोश्री गए क्यों...? आईपीएल में ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के खेलने को लेकर धमकी दी गई शिवसेना की तरफ से... ज़ाहिर सी बात है शिवसेना अभी ज़िंदा है यो तो सबको बताना होगा... लिहाज़ा उपस्तिथि दर्ज करानी ज़रूरी है... शाहरुख़ ख़ान और राहुल गांधी का मसला अभी ताज़ा ही है... दरअसल ये सब हो रहा है मुद्दा पहले कौन झपटता है को लेकर... चाचा-भतीजे की लड़ाई... पाकिस्तानी खिलाड़ी नहीं खेलेंगे... ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी नहीं खेलेंगे... और आगे आने वाले दिनो में ये भी हो सकता है कि शिवसेना कह दे कि भारतीय खिलाड़ी भी नहीं खेलेंगे... जो शिवसेना सचिन तेंदुलकर पर निशाना साध सकती है वो कुछ भी कर सकती है... दरअसल ये सब छटपटाहट है उस हार की जो एक के बाद एक ठाकरे को मिल रही है... अब तो ये सब सुनकर हंसी आती है और सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि जिस तरह से नक्सली चुनाव से पहले अपनी उपस्तिथि दर्ज कराते हैं... उसी तरह से ठाकरे चुनाव की हार के बाद अब हर रोज़ चुनाव की तरह ही उपस्तिथि दर्ज करा रहे हैं... ख़ैर सुर्खियों में बने रहेंगे तभी तो ज़िंदा होने का सबूत देते रहेंगे... लेकिन सवाल ये है कि पवार क्यों गए मातोश्री... क्या सरकार का एक नुमाइंदा जो कि केंद्रीय मंत्री है, सत्ता में जिसकी भागीदारी है, चाहे वो राज्य की सरकार हो या केंद्र की... वो साबित क्या करना चाहता है कि सरकार कमज़ोर है वो ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कर सकती... और उनकी मजबूरी है सरकार के साथ रहना...
या फिर... लगातार महंगाई की वजह से अपने सहयोगियों और कांग्रेस के निशाने पर रहे पवार ये जताना चाहते हैं कि उनके पास विकल्प खुले हैं... आख़िर इस मुलाक़ात का मक़सद क्या है...?

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

क्या है पर्दे के पीछे ?

बड़े बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले...
अमर सिंह को समाजवादी पार्टी ने बड़ी ही बेइज़्ज़ती के साथ बाहर का रास्ता दिखाया... जो अमर से अब बर्दाश्त नहीं हो रहा... सच ही तो है जो अमर हमेशा ही सपा के साथ हर कहानी में खड़े होते रहे, चाहे वो सरकार बनाना हो या सरकार बचाना... उसी अमर कहानी को सपा यूं इस तरह से ख़त्म कर देगी सोचा ना था... अमर निकाल दिए गए साथ ही जया प्रदा को भी पार्टी ने बाय-बाय कह दिया... ये वही अमर-जया हैं जो कभी लोकसभा चुनाव से पहले सुर्ख़ियों में थे और पार्टी के महासचिव आज़म ख़ान पर गुर्राते हुए मीडिया के सामने आते थे... और सपा से आज़म को बाहर करवाकर ही दम लिया... कहते हैं कि वक्त ख़ुद को एक बार ज़रूर दोहराता है लेकिन इतनी जल्दी वक्त ख़ुद को दोहराएगा सोचा ना था... जो अमर, आज़म पर सीडी-सीडी चिल्लाकर चुनाव जीतने की सीढ़ी तैयार कर रहे थे... वही आज ये कहते नज़र आ रहे हैं कि उनके पास किसी की कोई सीडी नहीं है... हां अलबत्ता वो अब पर्दे की बात करते नज़र आ रहे हैं... और बड़े ही शायराना अंदाज़ में नेताजी को धमकी दे गए... कह गए “पर्दे में रहने दो पर्दा ना उठाओ, पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा” सच तो है कि अमर पिछले 14 सालो से मुलायम के साथ हैं और वो हर काला-सफ़ेद राज़ जानते हैं जो वाकई में पर्दे के पीछे छुपा हुआ है... सपा के इसी पर्दे पर अमर फिल्म जगत के बड़े सितारों को लेकर आए और उत्तर प्रदेश में उन्होने मायानगरी के दर्शन कराए जिसका की फ़ायदा सपा को हुआ है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता... अमर-जया निकाल दिए गए और उनके पीछे एक-एक कर अब सपा से सितारे भी निकलने लगे हैं और लगता है कि वाकई अब एसपी अब सितारा पार्टी की बजाए समाजवादी पार्टी बन जाएगी... जाने का सिलसिला जारी है लेकिन सवाल यही उठता है कि आख़िर पर्दे के पीछे वो राज़ कौन सा है जिसे अमर गुनगुना तो सकते हैं लेकिन बयां नहीं कर सकते...।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

किसकी है मुंबई ?

एक ऐसा सवाल जिसका जवाब सबको पता है या फिर किसी को भी पता नहीं है आख़िर किसकी है मुंबई ? मराठी मानुष की, उत्तर भारतीयों की, दक्षिण भारतीय की, एक आम आदमी की, सपनों की, अपनों की, सरकार की, भ्रष्टाचार की, आख़िर किसकी है ये मायानगरी ?
बाल ठाकरे अब बूढ़े हो चुके हैं और पिछले दो चुनावों में शिवसेना हार का सामना कर चुकी है, बाल ठाकरे के बाद उनकी विरासत संभालना थी उनके बेट उद्धव ठाकरे को, लेकिन बेटा वो कुछ नहीं सीख सका जो भतीजा धीरे-धीरे साथ रहकर सीख रहा था, वो सीख रहा था डिवाइड एंड रूल का फॉर्मूला, वो फॉर्मूला जो हिंदुस्तान को विरासत में मिला था अंग्रेज़ो से, फूट डालो, शासन करो। दरअसल ये सब सत्ता की जंग है जिसमें हर बार की तरह पिस रहा है आम आदमी।
शिवसेना का विभाजन हुआ और बनी नई पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना साथ ही महाराष्ट्र में जन्म हुआ एक और बाल ठाकरे का, नया नाम राज ठाकरे।
राज ठाकरे को ये बताना था कि वो उद्धव से ज़्यादा क़बिल हैं और सेना की कमान वही संभाल सकते थे चाचा-भतीजे और कुर्सी की लड़ाई में वही हो रहा है जिसका हश्र सबके सामने है।
राजनीति में सिर्फ कुर्सी और जीत ही लक्ष्य होता है चाहे वो किसी भी क़ीमत पर मिले लेकिन क़ीमत यहां पर कौन चुका रहा है सबके सामने है, मुंबई पर हक़ जताया जा रहा है जो आग ठंडी हो चुकी थी उसे एक बार फिर से हवा दी गई है भतीजे ने इस आग को फिर हवा दी और चाचा अब इस आग में अपने हाथ सेंकने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वो कहते हैं ना कि आग में हाथ सेंकते वक्त सावधानी ना बरती जाए तो हाथ जल भी सकते हैं और शिवसेना के साथ वही हुआ है 26 साल पुराना गठबंधन या समझौते में अब तलाक हो चुका है ! संघ और शिवसेना भगवा राजनीति के दो साथी और सबसे बड़े घोषित स्तंभ लेकिन मराठी-ग़ैर मराठी विवाद पर अब दोनो आमने-सामने हैं। संघ का बयान आया मुंबई सबकी है, जवाब में सेना ने हमला बोला हमें ना सिखाएं, भाजपा... संघ का ही गोद लिया बेटा जो या यूं कहें की चेहरा भाजपा का है लेकिन पीछे संघ खड़ा है सबको पता है, भाजपा ने भी कह दिया की ‘सभी भारतीयों को देश में कहीं भी बसने का हक़ है’ इसी बयानबाज़ी में राज भी कूदे और कह दिया कि ‘मुंबई में जन्म लेने वाला ही मराठी’, राहुल गाधी बोले केंद्रीय गृह मंत्री भी बोले की मुंबई सबकी है, लेकिन सवाल ये है कि ये सबको पता है कि मुंबई सबकी है लेकिन अपने ही देश में ये बात बताई क्यों जा रही है, क्या मुंबई महाराष्ट्र में नहीं है ? क्या महाराष्ट्र भारत में नहीं है ? क्या महाराष्ट्र में भारतीय नहीं रहते ? क्या जो मराठी मानुष की बात करते हैं वो मराठी मानुष को भारतीय नहीं मानते ? सवाल कई है लेकिन जवाब मांगा किससे जाए ? अगर मुंबई इन्हीं लोगों की जागीर है तब कहां गए थे ये लोग जब 26/11 जैसा सबसे बड़ा हमला मुंबई पर हुआ था तब क्या नींद आ गई थी इन लोगों को ? अगर इतने ही मुंबई के हिमायती और जागीरदार हैं तो चले आते मैदान में और ख़त्म कर देते उस दुश्मन को जो देश की तरफ़ बार बार नज़र उठाने की हिम्मत करते हैं, देश को अगर बचा नहीं सकते तो, अगर उसे ताक़तवर नहीं बना सकते अगर उसे एक मुट्ठी तरह बाध नहीं सकते वो मुट्ठी जिसकी ताक़त पर हमें नाज़ है तो कम से कम उसे कमज़ोर मत करो अपने स्वार्थ के चक्कर में। लेकिन सबके बीच महाराष्ट्र सरकार क्यों चुप है यो बात ज़रूर चुभती है क्यों इस तरह के लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं होती, जवाब है वो भी तो राजनीति और कुर्सी को हाथों मजबूर है और शायद ये सरकार भूल गई है आख़िर ये मुंबई है किसकी ?

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

क्या लिखूं...?

बहुत दिन हो गए कुछ लिखे हुए... आज सोचा कि लिख लिया जाए... लिखने के लिए वैसे तो मूड की ज़रूरत होती है लेकिन वो मूड कई दिन हो गए बन नहीं रहा था... फिर सोचा कि जो भी मन में आए लिख दो... शायद इसी से लिखना सीख जाऊं... क्यूं है ना... ख़ैर आपको इस बीच जितने भी हमारे ख़ास त्योहार गुज़रे उनकी तहेदिल से मुबारकबाद...शुभकामनाएं...
हम लिखने पर थे कि क्या लिखूं... हम हर वक्त हमारे आस-पास बहुत कुछ होते हुए देखते सुनते और पढ़ते हैं... आज तो इतने सारे न्यूज़ चैनल हो चुके हैं कि जब भी टीवी ऑन करो हर चैनल पर अपना अलग मसाला अलग ख़बर चलती दिखाई दे रही है... क्या हम उन ख़बरों के बारे में बातचीत करें... क्या हम ये बात करें कि प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर में नई रेल लाइन का उद्घाटन किया... और वहीं से पाकिस्तान और अलगाववादियों को हर मुद्दे पर बातचीत के लिए कह भी दिया... क्या हम ये बात करे कि राजधानी एक्सप्रेस जिसे माओवादियों(नक्सलियों) ने रोका था वो आख़िरकार दिल्ली पहुंच गई है... क्या कहूं कि जो पाकिस्तान आतंकियों को पनाह दे रहा था जो उन्हें दूसरों को कमज़ोर करने के लिए पैदा कर रहा था और पाल रहा था वही आज उनका शिकार हो रहा है... वहां रोज़ ही धमाके हो रहे हैं...जिसमें बेगुनाह और मासूम मारे जा रहे हैं... क्या लिखूं कि सेंसेक्स जो 17 हज़ार से उपर था अब 16 हज़ार के नीचे कारोबार रहा है.... क्या हम ये बात करे कि जो नई क्रेडिट पॉलिसी का एलान हुआ है उसे वित्त मंत्री ने अच्छा कहा है... क्या हम टीम इंडिया की जीत की बात करें... क्या हम सलमान-शाहरुख़ के अलग-अलग रैंप पर उतरने की बात करे... आख़िर हम क्या बात करें... आख़िर हम क्या लिखें... लेकिन सवाल यहीं ख़त्म नहीं होता... क्यूंकि लिखना तो है... लेकिन क्या लिखूं.... ये एक बड़ा सवाल है.... और इस सवाल का जवाब मुझे आपसे चाहिए... उम्मीद पर दुनिया क़ायम है और इसी उम्मीद के साथ कि आप मेरी मदद करेंगे मुझे रास्ता दिखाएंगे फिलहाल आपसे इजाज़त चाहता हूं...

शनिवार, 1 अगस्त 2009

हंगामा क्यूं है बरपा...?

काश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक भारत एक है...अब तक क़िताबों में यही पढ़ा है और यही पढ़कर हम सब बड़े हुए है लेकिन आज जो हम देख रहें है वो ये साबित भी करता है कि हां वाक़ई में हम एक है लेकिन हम अपनी एकता को जिस रुप में देख रहें हैं क्या वो रुप वाक़ई में हिंदुस्तान का रुप है क्या ये हमारा मुल्क है क्या हम ये हैं... आप सोच रहे होंगे कि मैं कहना क्या चाहता हूं...दरअसल मैं बात कर रहा हूं हिंदुस्तान की उस आवाज़ की जो हमारी आवाज़ बनकर कभी विधानसभा...तो कभी लोकसभा में सुनाई देती है...हां हिंदुस्तान की आवाज़...
लेकिन जो कुछ भी हो रहा है उसे आप भी जानते हैं क्यूंकि ख़बरें आप भी देखते हैं और अगले दिन न्यूज़ पेपर में पढ़ते भी हैं...पहले बात करते हैं विधानसभा की...शुरुआत वहीं से जहां हिंदुस्तान शुरु होता है जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जो हंगामा इस वक्त बरपा हुआ है आख़िर वो सब क्यूं है... शोपियां बलात्कार और हत्या मामले को लेकर पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती विधानसभा अध्यक्ष की आसंदी तक पहुंच गई एक माइक उन्होने उठाकर फेंक दिया और दूसरा माईक भी उखाड़ने की कोशिश की लेकिन वो उनसे उखड़ नहीं पाया...अगले दिन फिर हंगामा हुआ और 2006 का सेक्स स्कैंडल का मामला गूंजा...इस बार निशाने पर आ गए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और वो अकेले नहीं बल्कि मुज़फ़्फर हुसैन बैग ने उनके वालिद और पूर्व मुख्यमंत्री फारूख़ अब्दुल्ला को नहीं बख़्शा और सेक्स स्कैंडल में दोनो का नाम घसीट दिया...बस फिर क्या था मुख्यमंत्री को ग़ुस्सा आ गया और उन्होने इस्तीफ़े का एलान कर दिया...और उस एलान के बाद विधानसभा में जो नज़ारा देखने को मिला क्या ऐसी होती है विधानसभा... और ये सियासी हंगामा अगले दिन भी चला बहरहाल मुख्यमंत्री अपना कार्य संभाल चुके हैं...
सवाल ये है कि आखिर हमारे सियासतदां चाहते क्या है और ये सब करके वो क्या बताना चाहते हैं हमें, क्यूंकि हमने ही उन्हें चुनकर वहां भेजा है...ये नज़ारा सिर्फ कश्मीर का ही नहीं है उत्तरप्रदेश में तो कईं सालो पहले विधानसभा में जो हुआ उसे कहने के लिए तो लफ़्ज़ भी नहीं मिल रहे कि किस तरह से जनप्रतिनिधि वहां एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे हो गए थे...और आज भी वहां नज़ारा कुछ अलग नहीं है....बिहार हो...मध्यप्रदेश...छत्तीसगढ़...उड़ीसा...झारखंड या फिर देश की कोई भी विधानसभा नज़ारा यही देखने को मिलेगा...विधानसभा क्या लोकसभा में भी यही सब कुछ दिख रहा है...और दिखे भी क्यों ना क्यूंकि हमारे देश के हर हिस्से से हमने चुनकर एक सांसद लेकसभा में भेजा है जो संसद में मौजूद है इसलिए कि हमारी समस्या हमारी आवाज़ को वो उस जगह पहुंचा सके...लेकिन संसद में जो कुछ हो रहा है वो किसी से छिपा नहीं है... वहां भी हंगामा ही हो रहा है...कभी किसी मुद्दे पर तो कभी किसी मुद्दे पर...लेकिन ये हंगामा क्यों बरपा हुआ है...
जहां भी जाओ जिधर भी देखो सिर्फ और सिर्फ हंगामा...सवाल ये है कि, क्या इसिलिए इन्हें हम चुनते है...? क्या यही सब हम देखना चाहते हैं...? क्या इसी तरह से ये हमारी परेशानी को ख़त्म कर देंगे...? क्या विपक्ष सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध कर रहा है...? और अगर हां तो ये कब तक चलता रहेगा...? क्या सिर्फ हंगामा खड़ा करने से तस्वीर बदल जाएगी...? या इनमें से कोई है जो ये सूरत बदलेगा...

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

कब मिलेगा सम्मान...?

कब मिलेगा सम्मान...
एक बार फिर से हुआ है हॉकी का अपमान...ताक पर रखा गया खिलाड़ियों का सम्मान...लुट गया खिलाडियों का स्वाभिमान...आख़िर कब तक होता रहेगा खिलाड़ियों का अपमान...कब तक लुटती रहेगी यूं ही चैंपियन्स की शान...और कब लौटेगा खिलाड़ियों का सम्मान..ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब का इंतज़ार हम सभी कर रहे है ख़ासकर वो जिन्हे अपने देश से अपने राष्ट्र से प्यार है...हम बात कर रहें है भारतीय हॉकी खिलाड़ियों के साथ बार बार हो रहे अपमान की... हॉकी टीम के साथ इन दिनो जो घट रहा है उसे किसी भी लिहाज़ से सही नहीं कहा जा सकता, चाहे वो पुरुष हॉकी खिलाड़ी हो या फिर महिला....देश के राष्ट्रीय खेल और खिलाड़ियों के साथ जो कुछ भी हो रहा है उसे क्या समझा जाए, ये आज की बात नहीं है कि हॉकी खिलाड़ियों के साथ इस तरह का बर्ताव किया जा रहा है आखिर कब मिलेगा सम्मान...? कब तक अपमान का घूंट पाकर ताज जीतते रहेंगे खिलाड़ी...आज हर हॉकी खिलाड़ी यही सवाल पूछ रहा है...महिला हॉकी टीम के साथ कुछ दिन पहले जो कुछ हुआ उसे सभी ने देखा और अब ऐसा ही वाकया हुआ है भारतीय पुरुष हॉकी टीम के साथ... यूरोप टूर के लिए अभ्यास में जुटी भारतीय हॉकी टीम को देश से रवाना होना था जिसके लिए उन्हे पुणे से दिल्ली जाना था लेकिन खिलाड़ियों को लाने के लिए बस ही नहीं पहुंची...
सबसे बड़ा सवाल आखिर कब मिलेगा सम्मान भारतीय हॉकी को और हॉकी खिलाड़ियों को...कभी भारतीय महिला हॉकी टीम के पास ट्रांजिट वीज़ा नहीं होता, और उन्हें एयरपोर्ट से वापस लौटना पड़ता है...जब उनसे बात होती है तब खिलाड़ी ये कहते है कि इससे हमारे मनोबल पर कोई फर्क़ नहीं पडेगा...और हमारी खिलाड़ी वाक़ई में क़ाबिले तारीफ़ है रशिया में जाकर चैंपियंस चैलेंज ट्रॉफी जीतकर लौटती है... लेकिन अफसोस है कि जब वो जीतकर वापस लौटती हैं तब उन्हें कोई लेने नहीं जाता...और सभी खिलाड़ी टैक्सी और ऑटो करके ख़ुद ही रवाना होती है...और एक बार फिर वही हुआ...अपमान, लगातार या बार-बार जो कुछ हॉकी खिलाड़ियों के साथ बर्ताव किया जा रहा है...अब ऐसे में ये उम्मीद कैसे लगाई जाए कि भारतीय हॉकी पुराने रुतबे को हासिल कर लेगी...
आखिर अपमान की ये आंधी कब तक चलती रहेगी और ऐसा कब तक होता रहेगा, क्या कोई है जो हॉकी को इंसाफ दिलाने के लिएआवाज़ उठाए, हॉकी का ये हश्र और क्रिकेट पर पैसे की बरसात, दो खेल जिन्हें खेलते तो खिलाड़ी ही है लेकिन इन खिलाड़ियों की तक़दीर बिल्कुल अलग है जो क्रिकेट खेलते हैं उन्हें मिलती है इज़्ज़त...दौलत...शोहरत और जो हॉकी खेलते हैं उन्हें मिलती है ज़िल्लत...मुफ़लिसी... और अपमान....आखिर कब मिलेगा इन खिलाड़ियों को सम्मान...लेकिन उम्मीद यही है कि ये सब कुछ होने पर खिलाड़ियों के मनोबल पर कोई फर्क ना पड़े...जैसा प्रदर्शन महिला टीम ने किया था वैसा ही प्रदर्शन पुरुष टीम भी करे...यही दुआ है...
सिर्फ हॉकी ही नहीं बल्कि दूसरे खेल के खिलाड़ी भी इसी तरह की ज़िल्लत उठाने को मजबूर है सुशील कुमार का नाम आपको याद होगा जिन्होने ओलंपिक में देश के लिए कांस्य पदक जीता था, कुछ दिनो पहले जब वो जर्मनी से कुश्ती ग्रांपी में स्वर्ण पदक जीतकर लौटे तब होना ये था कि कोई अधिकारी उन्हें लेने जाते लेकिन किस्मत देखिए यहां भी एयरपोर्ट कोई नहीं गया और वो ख़ुद ही घर की तरफ़ चल दिए...रेणु गोरा का मामला हाल फिलहाल मीडिया में नया है बॉक्सिंग फेडरेशन ने जांच की बात कही है लेकिन जांच होती है या नहीं और अगर होती है तब किस तरह की कार्रवाई होती है येदेखना होगा...बहरहाल एक बार फिर खिलाड़ियों का अपमान होने पर सवाल उठने लगे है सवाल उठने लगे है अधिकारियों पर... सवाल उठने लगे हैं कार्यप्रणाली पर...सवाल ये भी है कि जिस खेल को सरकार ना पैसा दे पा रही है और ना सुविधाएं और ना कप जीतकर लौटने पर उनका स्वागत कर पा रही है, ऐसे में क्या उम्मीद की जाए...क्या राष्ट्रीय खेल का अपमान देश का अपमान नहीं है...? जो अंधेरा इस वक्त हॉकी पर छा रहा है...जो ग्रहण लगा है उस अंधेरे... उस स्याह रात की सुबह कभी होगी....?