सोमवार, 6 सितंबर 2010

मेरी आवाज़ ’इंक़लाब’


बग़ावत का झंडा बुलंद कर, आवाज़ अपनी उठा

कर अपना सर ऊंचा, एक चीख़ ऐसी लगा

हिल जाएं हुकूमत की जड़ें, आंधियां भी चल पड़ें

तू भूखा रह और भूखा ही आगे बढ़

कुछ खाया तूने तो तुझे नींद आ जाएगी

और आंखें बंद की तो आवाज़ भी खो जाएगी

जागना है तुझको, औरों को भी जगाना है

शायद इस बार इंक़लाब तुझे ही लाना है

ज़िंदाबाद, ज़िंदाबाद के नारे बहुत लगा लिए तूने

अब तुझे कुछ कर दिखाना होगा

ना उम्मीदी के सूरज को डुबाकर

उम्मीद की किरण को लाना होगा

तुझे चलना है उस पश्चिम की तरफ

जहां डूबी हुई उम्मीदें हैं...........

तुझे भी डूबना होगा इन्हीं उम्मीदों के लिए

एक नए कल के लिए...

सूरज फिर से निकलेगा, पंछी फिर से गाएंगे

एक नया घर, गांव, प्रदेश, एक नया देश हम बसाएंगे

वो देश जहां खुशहाली हो, हरियाली हो

वो देश जहां हर कंधे पर जिम्मेदारी हो...

आओ मिलकर फिर से एक सवेरा लाएं...

दर्द, भूख, बीमारी, गरीबी हर अंधकार को दूर भगाएं...

आओ मिलकर हम अपनी आवाज़ उठाएं...

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

रिश्ते...


रिश्ते... कुछ रिश्ते हमें विरासत में मिलते हैं... और कुछ हमें किस्मत से... वो किस्मत जो हम बहुत ज़्यादा तपस्या या इबादत के बाद हमें ईनाम में मिली होती है... उसकी तरफ़ से जिसने हमें पैदा किया... एक बहुत सी नाज़ुक सी डोर से बंधे हुए होते है रिश्ते ज़रा सा हवा का तेज़ झोंका आया और टूटने का डर... ज़रा सा बोझ पड़ा इन पर और ये सहन नहीं कर पाते... लेकिन जितने नाजुक होते हैं रिश्ते उतने ही मज़बूत भी होते हैं... तब जब हम एक-दूसरे पर भरोसा करें... रिश्ते कभी बोझ नहीं होते... उन्हें जिया जाता है ज़िंदगी की तरह, वो सांस लेते हैं, वो महकते हैं, वो चलते हैं ताउम्र साथ-साथ क़दम से क़दम मिलाकर, अगर रिश्ते बोझ बनने लगे तो उन्हें तोड़ देना चाहिए... लेकिन क्या रिश्ते कभी टूटते हैं... शायद हां और शायद नहीं भी, हां इसलिए कि जिस तरह शीशा टूटता है उसी तरह रिश्ते भी टूटते हैं और अगर नहीं तो फिर शीशे के जुड़ने पर भी इसके टूटने के निशां क्यों मौजूद होते हैं... जो टूट गया शायद वो कभी जुड़ भी जाए... लेकिन जो छूटकर बिखर गया हो उसका क्या...? उसे तो सिर्फ समेटा ही जा सकता है और शायद मैं भी कुछ समेटने की कोशिश कर रहा हूं... रिश्ते बनाना बहुत आसान होता है और निभाना उतना ही मुश्किल, बहुत पहले सुना था लेकिन वाकई सच्चाई भी यही है, अगर रिश्ता है तो भरोसा बहुत ज़रूरी है, रिश्ता दो लोगों के बीच मोहब्बत और नफरत का होता है या फिर रिश्ता नहीं है तो वो अजनबी ही होते हैं... लेकिन अजनबी कौन हैं... ये एक बड़ा सवाल है...? जिसके जवाब का मुझे इंतज़ार है...

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

आख़िर कब तक...?

6 अप्रैल 2010... वो तारीख़ जो शायद कुछ लोग भूल जाएंगे... क्योंकि उन्होनें अपनों को सिर्फ नाम के लिए खोया है... उन्हें गिनती आती है... वो फिर से गिनती करेंगे... और कहेंगे 76 जवान शहीद हो गए... हमें दुख है, अफसोस है... और कुछ कभी नहीं भूल पाएंगे... इसलिए... क्योंकि एक बार फिर किसी का भाई... किसी का बेटा... किसी का सुहाग... और किसी के सर से साया छिन गया है... ‘छत्तीसगढ़’ में अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ है... जिसमें इतने जवान शहीद हुए हैं... कुछ ने हमले की निंदा कि... नक्सलियों की कायरता करार दिया... तो किसी ने इस मामले में राजनीति कि... कहा कि राज्य सरकार नैतिक ज़िम्मेदारी ले और कुर्सी छोड़ दे... सवाल ये है कि क्या कोई इस हमले कि नैतिक ज़िम्मेदारी लेगा...? जिनकी ज़िम्मेदारी है... वो सिर्फ बयान देंगे... आपात बैठक लेंगे... रणनीति पर चर्चा करेंगे... अफसोस ज़ाहिर करेंगे... बड़ी चूक हुई है... ये भी मानेंगे... कहां चूक हुई है... इस पर समीक्षा करेंगे... और फिर से ये सारी बैठक... महज़ चिंतन पर ख़त्म हो जाएगी... कब तक...? आख़िर कब तक...? आर-पार की लड़ाई की बात कही जाएगी... क्या सिर्फ बैठकें ही होती रहेंगी या फिर कभी वो भी होगा... जिसकी कि अक्सर बात कही जाती है... क्या बातें कभी अमल में लाई जाएंगी...? क्यों बार-बार हमारी ही रणनीति नाकाम होती है...? क्यों बार-बार नक्सली कामयाब होते हैं... क्यों नक्सलियों के जाल में हमारे ही जवान उलझते हैं...? एक ही रणनीति नक्सली बार-बार अपनाते हैं... और उसी राह पर जवान भेज दिए जाते हैं... सिर्फ शहीद होने के लिए... इससे पहले भी इसी तरह के हमले हो चुके हैं... जिसमें नक्सली घात लगाकर बैठे थे... और 06 अप्रैल को भी यही हुआ... अगर ये केंद्र और राज्य का ज्वाइंट ऑपरेशन है... तब सीआरपीएफ के जवानों के साथ क्यों स्थानीय पुलिस फोर्स के जवान नहीं थे... अगर बाहर से आने वाले जवान जो कि चिंतलनार के भौगोलिक हालात से वाकिफ नहीं थे... क्यों उनके साथ किसी स्थानीय को नहीं भेजा गया...? हमेशा तालमेल बैठाने को लेकर ही बैठकें होती हैं... लेकिन तालमेल कहीं दिखाई नहीं देता... नक्सलवाद हमेशा से एक मुद्दा रहा है... जो देश के लिए इस वक्त सबसे बड़ा ख़तरा है... लेकिन राज्य और केंद्र की सरकारें हमेशा ही इससे बचती रही हैं... या भागती रही हैं... गृहमंत्री पी चिंदबरम की तारीफ करनी होगी... जिन्होने इसे ना सिर्फ गंभीर माना है बल्कि एक साहसिक क़दम उठाया है... लेकिन अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता... और शायद हमें भी इंतज़ार करना होगा... इंतज़ार... की इस बार सुबह गोलियों की आवाज़ों से ना हो... बल्कि चिड़िया की चहचहाहट से हो मुर्गे की बांग से हो... सूरज सुबह लालिमा लेकर ही आए... लेकिन वो रंग लालगढ़ के आतंक का ना हो... बल्कि एक ख़ुशनुमा सुबह हो...

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

ड्रग्स... ड्रिंक और ड्रामा

राहुल महाजन नाम तो आपने सुना होगा... भाजपा के दिवंगत नेता प्रमोद महाजन की बिगड़ी हुई औलाद... आजकल एक टीवी प्रोग्राम में स्वंयवर रचा रहे हैं... क्या है ये राहुल महाजन... और कौन है...? ये किसी से छुपा नहीं है... एक अय्याश किस्म का रईसज़ादा... जिसने अपने पिता के पैसे पर ऐश किया है वो सब किया है जो एक बिगड़ा हुआ रईसज़ादा करता है... प्रमोद महाजन की मौत के बाद राहुल चर्चा में आया... विवादों में घिरा रहना पसंद है ड्रग्स लेने का संगीन इल्ज़ाम लगा... लेकिन इन सबके बीच कोई था जो साए की तरह साथ था... जी हां वो थी श्वेता... वही श्वेता जो कभी राहुल की दोस्त हुआ करती थी... उसके बाद पत्नी... और अब राहुल की तलाकशुदा... एक ज़िंदगी जिसे बरबाद किया राहुल महाजन ने... सबके सामने है और बाक़ी पर्दे के पीछे कितनी है कहा नहीं जा सकता... ख़ैर पर्दे पर एक ज़िंदगी बरबाद करना क्या कम था... जो बाकी की ज़िंदगियां ख़ुद ही राहुल के हाथों बरबाद होने के लिए आ गई... जी हां मैं उन्हीं लड़कियों की बात कर रहा हूं जो एक टीवी शो में राहुल से शादी करने के लिए आई हैं... आख़िर क्या पसंद आया इन्हें इस राहुल महाजन में, समझ से परे है... उसका ड्रग्स लेना... ड्रिंक करना... उसका एक हंसती खेलती ज़िंदगी को उजाड़ना... या फिर ड्रग्स और ड्रिंक लेने वाले को लेकर, छोटे पर्दे पर जो ड्रामा चलाया जा रहा है उस ड्रामे का हिस्सा बनकर सस्ती लोकप्रियता बटोरना... सवाल ये है कि प्रोड्यूसर-डायरेक्टर को राहुल महाजन कोई और अच्छा नहीं मिला या फिर सिर्फ राहुल महाजन ही मिला... ख़ैर कुछ हो ना हो टीवी चैनल को टीआरपी बटोरने का धंधा तो आता ही है... पहले राखी सावंत के स्वयंवर के नाम से सगाई कर दी... और दर्शकों को ठग्गू के लड्डू खिला दिए... अब राहुल महाजन की शादी... जो भी हो... लेकिन सच ही तो है... जो दिखता है वो बिकता है...!

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

दुलार मिलेगा या मार ?

जिस तरफ जाओ महंगाई को लेकर हाय तौबा मची हुई है और लोगों की नज़रें अब वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी पर टिकी हैं जैसे कि वो कोई चमत्कार करने वाले हैं... उम्मीदें बहुत सी हैं हर बार की तरह... लेकिन एक बात तो साफ है कि आने वाला बजट लोक लुभावन शायद ही हो... क्योंकि सामने चुनाव नहीं है पिछली बार की तरह... करोड़ों लोगों की अरबों उम्मीदें... क्या वित्त मंत्री खरा उतर पाएंगे इन उम्मीदों पर...? गांव, ग़रीब, किसान, व्यापारी, बिज़नेस घराने, युवा, महिलाएं, बच्चे, बूढ़े, यानि की हर वर्ग जो सरकार की नज़रों में इसानी श्रेणी में आते हैं वो भी और जो सरकार की नज़र में इंसान नहीं हैं वो भी... सभी की उम्मीद टिकी है इस बजट पर... कैसा होगा बजट...? हर टीवी चैनल की एक हेडलाईन और आधा दिन बजट में क्या होगा ? क्या उम्मीदें है हर वर्ग की... इसी में लगा है... प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया... हर जगह एक ही चर्चा, चाय की दुकान हो या गांव की चौपाल... सब्ज़ी मंडी हो या 5 स्टार होटल, कॉलेज हो या शराब खाने, सबको इस बात की फिक्र है कि क्या तोहफ़ा मिलने वाला है।
उम्रे दराज़ मांग कर लाए थे चार दिन, दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में, रातों की नींद तक गवां रखी है सबने सिर्फ इस फिक्र में की क्या होगा प्रणब दा के पिटारे में, क्या होगा ? अजीब सवाल है, पुरानी बोतल में नई शराब परोसी जाएगी या सिर्फ ख़ाली बोतल सामने रख दी जाएगी, मंदी को पूरी तरह से ख़त्म करने के लिए कौन सा बड़ा हिम्मत वाला क़दम उठाया जाएगा...? नई नौकरियां कैसे पैदा होंगी...? पढ़े-लिखे और अनपढ़ बेरोज़गारों के लिए क्या कोई काम निकलेगा ? आम आदमी का हाथ थामकर आगे बढ़ने वाली कांग्रेस आम आदमी को इस महंगाई से अपना हाथ पकड़कर बाहर निकालेगी, मंदी का डटकर मुकाबला करने के लिए पीठ थपथपाएगी, बच्चों को प्यार से सहलाएगी या फिर एक कसकर थप्पड़ मारेगी ? क्या होगा मुझे भी इंतज़ार है...

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

जनाब ये ‘सरकारी’ बंद है...

13 फरवरी 2010, दिन शनिवार... आज छत्तीसगढ़ बंद है... वजह महंगाई... बंद किया है भाजपा ने... क्यों...? महंगाई के लिए ज़िम्मेदार है केंद्र सरकार...। लेकिन सवाल ये हैं कि क्या सिर्फ केंद्र की ही ज़िम्मेदारी है... क्या इससे निपटने में राज्य की कोई भूमिका नहीं... अगर नहीं तो भाजपा बंद बुला सकती है... और अगर हां तो भाजपा को कोई हक़ नहीं बनता बंद बुलाने का... तब जबकि वो ख़ुद राज्य में शासन कर रही है... छत्तीसगढ़ में चलता है रमन का राज... वो इसलिए क्योंकि मुख्यमंत्री ने पुलिस और प्रशासन को अपनी जेब में रखा हुआ है और रही बात पत्रकारों की तो मुख्यमंत्री ने उनका मुंह ‘हवाले’ से बंद कर रखा है... ख़ैर ये तो बात हुई तानाशाही की... मुख्यमंत्री ख़ुद कहते हैं कि सगंठन का बंद है और सफलता मिलेगी... ज़ाहिर सी बात है जब मुख्यमंत्री ख़ुद मीडिया के सामने बंद होने से पहले ही बंद के सफल होने की बात करते हैं तो बंद सफल क्यों नहीं होगा... सवाल है, क्या किसी मुंख्यमंत्री को बंद का समर्थन करना चाहिए...? अगर बंद होता है तो प्रशासन और पुलिस उसे सुरक्षा मुहैया कराते हैं जो बंद का समर्थन ना करते हुए अपना प्रतिष्ठान खोलना चाहते हैं... लेकिन पुलिस और प्रशासन तो मुख्यमंत्री की जेब में है... लिहाज़ा शटर खोलेगा कौन...? एक तरफ़ आम आदमी महंगाई से परेशान है दूसरी तरफ इस बंद ने ग़रीबों की रोटी भी छीन ली... जब काम ही नहीं होगा तो ग़रीब का पेट कैसे भरेगा... बसें बंद हैं... स्कूल बंद हैं... कॉलेज बंद हैं... इसलिए लोग परेशान होते रहें... कोई फर्क नहीं पड़ता... क्या बंद करने से महंगाई का शटर गिर जाएगा... ख़ैर महंगाई कम हो ना हो लेकिन बंद तो होगा... भाई ‘सरकारी’ बंद है...

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

यहां सपने देखना गुनाह है ?

आख़िरकार... वही हुआ जिसका अंदेशा था... मुंबई में जो जंग चल रही है वो जगज़ाहिर है... और इसका फ़ौरी नतीजा निकल आया है मुंबई में फिल्म रिलीज़ नहीं हो रही है... वही मुंबई जहां फिल्में बनती है... जहां से सपना और सफ़र शुरु होता है... जहां हर रात कोई सितारा जगमगाता है, तो कोई सितारा टूट जाता है... कोई सितारा गर्दिश में रहता है तो कोई आसमान में उतनी ही ख़ूबसूरती और रौशनी के साथ चमकता है... ये मुंबई शहर है सपनों का... अपनों का... सितारों से सजी मायानगरी... लेकिन ये बात लगता है कि अब पुरानी और बेमानी हो चली है... ताज़ा हालात को मद्देनज़र रख तो यही कहा जा सकता है... कि ये मायानगरी नहीं गुंडों की नगरी है... यहां सितारो की झिलमिलाहट नहीं यहां तो अंधेरा बसता हैं... यहां सपने तो हैं... लेकिन अपने नहीं... यहां तो वो हैं जो सपनों को तोड़ते हैं... और सवाल अगर अपनो का हो तो अपनों के लिए यहां कोई जगह नहीं है... यहां अपना है कौन ? यहां तो मराठी मानुष हैं, यहां उत्तर भारतीय हैं, यहां शिवसेना है, यहां मनसे है, यहां राजनीतिक पार्टियां हैं... लेकिन यहां कोई अपना नहीं है... वो कहते हैं ना कि दीया तले अंधेरा... यहां भी वही हाल है जितनी चकाचौंध मुंबई में है... उतनी शायद ही देश के किसी कोने में हो...? लेकिन ये भी एक सच्चाई है भले ही कड़वी सही लेकिन यहां अंधेरा भी बहुत है... और उन अंधेरो में इंसान नहीं हैवान बसते है... क्योंकि हैवान ही किसी के सपनों को तोड़ सकता है... इंसान नहीं... अगर माइ नेम इज़ ख़ान औरों की तरह एक सपना है तो क्या सपनों का यही अंजाम होता है...? क्या किसी को सपना देखने का हक़ नहीं...? क्या मुंबई में सपना देखना गुनाह है...? क्या यही है सपनों की नगरी...? क्या यही है मायानगरी...?

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

सठिया गए हैं पवार !

पवार की ठाकरे से मुलाक़ात पर अब सियासत होने लगी है कोई नई बात नहीं है हम रोज़ ही देखते हैं... मैने कल भी लिखा था कि क्या है इस मुलाक़ात के पीछे... वाकई आख़िर पवार चाहते क्या हैं... क्या हो गया है उन्हें... महंगाई को लेकर लगातार विपक्ष और मीडिया के निशाने पर रहने के कारण क्या उनका दिमाग़ फिर गया है या फिर उन्हें सुर्ख़ियों में रहना पसंद है... याद रहे ये वही शरद पवार है जो कभी कांग्रेस में एक अच्छा मुक़ाम रखते थे... लेकिन सोनिया गांधी का विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर 1999 में इन्होने कांग्रेस से किनारा कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया था... लेकिन कहते हैं ना कि राजनीति में सब कुछ जायज़ है और पवार ने जब कांग्रेस के पास पावर देखा तो फिर से कांग्रेस के नज़दीक आ गए... पिछली लोकसभा में मंत्री थे... इस बार भी मंत्री है अपने पसंदीदा मंत्रालय में बैठे हैं लेकिन सवाल अब भी वही है कि ऐसा क्यों...? दरअसल इसके पीछे ये तथ्य हो सकता है, शरद पवार का जन्म हुआ था 12 दिसंबर 1940 को ... यानि की शरद पवार 60 साल पार चुके हैं... जब वो 60 की दहलीज़ पर थे तब सठियाए थे, उन्होने कांग्रेस छोड़ने का एक बड़ा क़दम उठाया था... और एनसीपी का गठन किया था... अब 70 के करीब हैं यानि की ये साठ के दशक से अब सत्तर के दशक में प्रवेश कर रहे हैं... और ऐसे में उन्होने बाल ठाकरे से मुलाक़ात की सुरक्षा को लेकर जबकि वो ख़ुद सरकार के नुमाइंदे हैं... एक बड़े पद पर बैठे हैं... और केंद्रीय गृहमंत्री पी चिंदबरम सुरक्षा की गारंटी दे चुके हैं ऐसे में उन्होने ये मुलाकात की है... अब इसे क्या कहा जाए... सच ही तो है पवार सठिया गए हैं...

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

एक मुलाक़ात ज़रूरी है ?

मैं ऑफिस में बैठा था कि अचानक एक ख़बर फ्लैश हुई... ब्रेकिंग न्यूज़ पवार मिलेंगे बाल ठाकरे से... पहला ख़्याल आया कि महंगाई से परेशान पवार हो सकता है कि अब मंत्र लेने जा रहे हों ठाकरे से मंहगाई पर क़ाबू पाने के लिए... लेकिन वक्त गुज़रने के साथ साथ कुछ-कुछ साफ़ होने लगा... चार दीवारी के भीतर क्या कुछ हुआ ये तो चारों ही जानते सकते हैं शरद पवार, शशांक मनहर, बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे... लेकिन सवाल ये है कि पवार मातोश्री गए क्यों...? आईपीएल में ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के खेलने को लेकर धमकी दी गई शिवसेना की तरफ से... ज़ाहिर सी बात है शिवसेना अभी ज़िंदा है यो तो सबको बताना होगा... लिहाज़ा उपस्तिथि दर्ज करानी ज़रूरी है... शाहरुख़ ख़ान और राहुल गांधी का मसला अभी ताज़ा ही है... दरअसल ये सब हो रहा है मुद्दा पहले कौन झपटता है को लेकर... चाचा-भतीजे की लड़ाई... पाकिस्तानी खिलाड़ी नहीं खेलेंगे... ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी नहीं खेलेंगे... और आगे आने वाले दिनो में ये भी हो सकता है कि शिवसेना कह दे कि भारतीय खिलाड़ी भी नहीं खेलेंगे... जो शिवसेना सचिन तेंदुलकर पर निशाना साध सकती है वो कुछ भी कर सकती है... दरअसल ये सब छटपटाहट है उस हार की जो एक के बाद एक ठाकरे को मिल रही है... अब तो ये सब सुनकर हंसी आती है और सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि जिस तरह से नक्सली चुनाव से पहले अपनी उपस्तिथि दर्ज कराते हैं... उसी तरह से ठाकरे चुनाव की हार के बाद अब हर रोज़ चुनाव की तरह ही उपस्तिथि दर्ज करा रहे हैं... ख़ैर सुर्खियों में बने रहेंगे तभी तो ज़िंदा होने का सबूत देते रहेंगे... लेकिन सवाल ये है कि पवार क्यों गए मातोश्री... क्या सरकार का एक नुमाइंदा जो कि केंद्रीय मंत्री है, सत्ता में जिसकी भागीदारी है, चाहे वो राज्य की सरकार हो या केंद्र की... वो साबित क्या करना चाहता है कि सरकार कमज़ोर है वो ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कर सकती... और उनकी मजबूरी है सरकार के साथ रहना...
या फिर... लगातार महंगाई की वजह से अपने सहयोगियों और कांग्रेस के निशाने पर रहे पवार ये जताना चाहते हैं कि उनके पास विकल्प खुले हैं... आख़िर इस मुलाक़ात का मक़सद क्या है...?

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

क्या है पर्दे के पीछे ?

बड़े बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले...
अमर सिंह को समाजवादी पार्टी ने बड़ी ही बेइज़्ज़ती के साथ बाहर का रास्ता दिखाया... जो अमर से अब बर्दाश्त नहीं हो रहा... सच ही तो है जो अमर हमेशा ही सपा के साथ हर कहानी में खड़े होते रहे, चाहे वो सरकार बनाना हो या सरकार बचाना... उसी अमर कहानी को सपा यूं इस तरह से ख़त्म कर देगी सोचा ना था... अमर निकाल दिए गए साथ ही जया प्रदा को भी पार्टी ने बाय-बाय कह दिया... ये वही अमर-जया हैं जो कभी लोकसभा चुनाव से पहले सुर्ख़ियों में थे और पार्टी के महासचिव आज़म ख़ान पर गुर्राते हुए मीडिया के सामने आते थे... और सपा से आज़म को बाहर करवाकर ही दम लिया... कहते हैं कि वक्त ख़ुद को एक बार ज़रूर दोहराता है लेकिन इतनी जल्दी वक्त ख़ुद को दोहराएगा सोचा ना था... जो अमर, आज़म पर सीडी-सीडी चिल्लाकर चुनाव जीतने की सीढ़ी तैयार कर रहे थे... वही आज ये कहते नज़र आ रहे हैं कि उनके पास किसी की कोई सीडी नहीं है... हां अलबत्ता वो अब पर्दे की बात करते नज़र आ रहे हैं... और बड़े ही शायराना अंदाज़ में नेताजी को धमकी दे गए... कह गए “पर्दे में रहने दो पर्दा ना उठाओ, पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा” सच तो है कि अमर पिछले 14 सालो से मुलायम के साथ हैं और वो हर काला-सफ़ेद राज़ जानते हैं जो वाकई में पर्दे के पीछे छुपा हुआ है... सपा के इसी पर्दे पर अमर फिल्म जगत के बड़े सितारों को लेकर आए और उत्तर प्रदेश में उन्होने मायानगरी के दर्शन कराए जिसका की फ़ायदा सपा को हुआ है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता... अमर-जया निकाल दिए गए और उनके पीछे एक-एक कर अब सपा से सितारे भी निकलने लगे हैं और लगता है कि वाकई अब एसपी अब सितारा पार्टी की बजाए समाजवादी पार्टी बन जाएगी... जाने का सिलसिला जारी है लेकिन सवाल यही उठता है कि आख़िर पर्दे के पीछे वो राज़ कौन सा है जिसे अमर गुनगुना तो सकते हैं लेकिन बयां नहीं कर सकते...।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

किसकी है मुंबई ?

एक ऐसा सवाल जिसका जवाब सबको पता है या फिर किसी को भी पता नहीं है आख़िर किसकी है मुंबई ? मराठी मानुष की, उत्तर भारतीयों की, दक्षिण भारतीय की, एक आम आदमी की, सपनों की, अपनों की, सरकार की, भ्रष्टाचार की, आख़िर किसकी है ये मायानगरी ?
बाल ठाकरे अब बूढ़े हो चुके हैं और पिछले दो चुनावों में शिवसेना हार का सामना कर चुकी है, बाल ठाकरे के बाद उनकी विरासत संभालना थी उनके बेट उद्धव ठाकरे को, लेकिन बेटा वो कुछ नहीं सीख सका जो भतीजा धीरे-धीरे साथ रहकर सीख रहा था, वो सीख रहा था डिवाइड एंड रूल का फॉर्मूला, वो फॉर्मूला जो हिंदुस्तान को विरासत में मिला था अंग्रेज़ो से, फूट डालो, शासन करो। दरअसल ये सब सत्ता की जंग है जिसमें हर बार की तरह पिस रहा है आम आदमी।
शिवसेना का विभाजन हुआ और बनी नई पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना साथ ही महाराष्ट्र में जन्म हुआ एक और बाल ठाकरे का, नया नाम राज ठाकरे।
राज ठाकरे को ये बताना था कि वो उद्धव से ज़्यादा क़बिल हैं और सेना की कमान वही संभाल सकते थे चाचा-भतीजे और कुर्सी की लड़ाई में वही हो रहा है जिसका हश्र सबके सामने है।
राजनीति में सिर्फ कुर्सी और जीत ही लक्ष्य होता है चाहे वो किसी भी क़ीमत पर मिले लेकिन क़ीमत यहां पर कौन चुका रहा है सबके सामने है, मुंबई पर हक़ जताया जा रहा है जो आग ठंडी हो चुकी थी उसे एक बार फिर से हवा दी गई है भतीजे ने इस आग को फिर हवा दी और चाचा अब इस आग में अपने हाथ सेंकने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वो कहते हैं ना कि आग में हाथ सेंकते वक्त सावधानी ना बरती जाए तो हाथ जल भी सकते हैं और शिवसेना के साथ वही हुआ है 26 साल पुराना गठबंधन या समझौते में अब तलाक हो चुका है ! संघ और शिवसेना भगवा राजनीति के दो साथी और सबसे बड़े घोषित स्तंभ लेकिन मराठी-ग़ैर मराठी विवाद पर अब दोनो आमने-सामने हैं। संघ का बयान आया मुंबई सबकी है, जवाब में सेना ने हमला बोला हमें ना सिखाएं, भाजपा... संघ का ही गोद लिया बेटा जो या यूं कहें की चेहरा भाजपा का है लेकिन पीछे संघ खड़ा है सबको पता है, भाजपा ने भी कह दिया की ‘सभी भारतीयों को देश में कहीं भी बसने का हक़ है’ इसी बयानबाज़ी में राज भी कूदे और कह दिया कि ‘मुंबई में जन्म लेने वाला ही मराठी’, राहुल गाधी बोले केंद्रीय गृह मंत्री भी बोले की मुंबई सबकी है, लेकिन सवाल ये है कि ये सबको पता है कि मुंबई सबकी है लेकिन अपने ही देश में ये बात बताई क्यों जा रही है, क्या मुंबई महाराष्ट्र में नहीं है ? क्या महाराष्ट्र भारत में नहीं है ? क्या महाराष्ट्र में भारतीय नहीं रहते ? क्या जो मराठी मानुष की बात करते हैं वो मराठी मानुष को भारतीय नहीं मानते ? सवाल कई है लेकिन जवाब मांगा किससे जाए ? अगर मुंबई इन्हीं लोगों की जागीर है तब कहां गए थे ये लोग जब 26/11 जैसा सबसे बड़ा हमला मुंबई पर हुआ था तब क्या नींद आ गई थी इन लोगों को ? अगर इतने ही मुंबई के हिमायती और जागीरदार हैं तो चले आते मैदान में और ख़त्म कर देते उस दुश्मन को जो देश की तरफ़ बार बार नज़र उठाने की हिम्मत करते हैं, देश को अगर बचा नहीं सकते तो, अगर उसे ताक़तवर नहीं बना सकते अगर उसे एक मुट्ठी तरह बाध नहीं सकते वो मुट्ठी जिसकी ताक़त पर हमें नाज़ है तो कम से कम उसे कमज़ोर मत करो अपने स्वार्थ के चक्कर में। लेकिन सबके बीच महाराष्ट्र सरकार क्यों चुप है यो बात ज़रूर चुभती है क्यों इस तरह के लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं होती, जवाब है वो भी तो राजनीति और कुर्सी को हाथों मजबूर है और शायद ये सरकार भूल गई है आख़िर ये मुंबई है किसकी ?

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

क्या लिखूं...?

बहुत दिन हो गए कुछ लिखे हुए... आज सोचा कि लिख लिया जाए... लिखने के लिए वैसे तो मूड की ज़रूरत होती है लेकिन वो मूड कई दिन हो गए बन नहीं रहा था... फिर सोचा कि जो भी मन में आए लिख दो... शायद इसी से लिखना सीख जाऊं... क्यूं है ना... ख़ैर आपको इस बीच जितने भी हमारे ख़ास त्योहार गुज़रे उनकी तहेदिल से मुबारकबाद...शुभकामनाएं...
हम लिखने पर थे कि क्या लिखूं... हम हर वक्त हमारे आस-पास बहुत कुछ होते हुए देखते सुनते और पढ़ते हैं... आज तो इतने सारे न्यूज़ चैनल हो चुके हैं कि जब भी टीवी ऑन करो हर चैनल पर अपना अलग मसाला अलग ख़बर चलती दिखाई दे रही है... क्या हम उन ख़बरों के बारे में बातचीत करें... क्या हम ये बात करें कि प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर में नई रेल लाइन का उद्घाटन किया... और वहीं से पाकिस्तान और अलगाववादियों को हर मुद्दे पर बातचीत के लिए कह भी दिया... क्या हम ये बात करे कि राजधानी एक्सप्रेस जिसे माओवादियों(नक्सलियों) ने रोका था वो आख़िरकार दिल्ली पहुंच गई है... क्या कहूं कि जो पाकिस्तान आतंकियों को पनाह दे रहा था जो उन्हें दूसरों को कमज़ोर करने के लिए पैदा कर रहा था और पाल रहा था वही आज उनका शिकार हो रहा है... वहां रोज़ ही धमाके हो रहे हैं...जिसमें बेगुनाह और मासूम मारे जा रहे हैं... क्या लिखूं कि सेंसेक्स जो 17 हज़ार से उपर था अब 16 हज़ार के नीचे कारोबार रहा है.... क्या हम ये बात करे कि जो नई क्रेडिट पॉलिसी का एलान हुआ है उसे वित्त मंत्री ने अच्छा कहा है... क्या हम टीम इंडिया की जीत की बात करें... क्या हम सलमान-शाहरुख़ के अलग-अलग रैंप पर उतरने की बात करे... आख़िर हम क्या बात करें... आख़िर हम क्या लिखें... लेकिन सवाल यहीं ख़त्म नहीं होता... क्यूंकि लिखना तो है... लेकिन क्या लिखूं.... ये एक बड़ा सवाल है.... और इस सवाल का जवाब मुझे आपसे चाहिए... उम्मीद पर दुनिया क़ायम है और इसी उम्मीद के साथ कि आप मेरी मदद करेंगे मुझे रास्ता दिखाएंगे फिलहाल आपसे इजाज़त चाहता हूं...

शनिवार, 1 अगस्त 2009

हंगामा क्यूं है बरपा...?

काश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक भारत एक है...अब तक क़िताबों में यही पढ़ा है और यही पढ़कर हम सब बड़े हुए है लेकिन आज जो हम देख रहें है वो ये साबित भी करता है कि हां वाक़ई में हम एक है लेकिन हम अपनी एकता को जिस रुप में देख रहें हैं क्या वो रुप वाक़ई में हिंदुस्तान का रुप है क्या ये हमारा मुल्क है क्या हम ये हैं... आप सोच रहे होंगे कि मैं कहना क्या चाहता हूं...दरअसल मैं बात कर रहा हूं हिंदुस्तान की उस आवाज़ की जो हमारी आवाज़ बनकर कभी विधानसभा...तो कभी लोकसभा में सुनाई देती है...हां हिंदुस्तान की आवाज़...
लेकिन जो कुछ भी हो रहा है उसे आप भी जानते हैं क्यूंकि ख़बरें आप भी देखते हैं और अगले दिन न्यूज़ पेपर में पढ़ते भी हैं...पहले बात करते हैं विधानसभा की...शुरुआत वहीं से जहां हिंदुस्तान शुरु होता है जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जो हंगामा इस वक्त बरपा हुआ है आख़िर वो सब क्यूं है... शोपियां बलात्कार और हत्या मामले को लेकर पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती विधानसभा अध्यक्ष की आसंदी तक पहुंच गई एक माइक उन्होने उठाकर फेंक दिया और दूसरा माईक भी उखाड़ने की कोशिश की लेकिन वो उनसे उखड़ नहीं पाया...अगले दिन फिर हंगामा हुआ और 2006 का सेक्स स्कैंडल का मामला गूंजा...इस बार निशाने पर आ गए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और वो अकेले नहीं बल्कि मुज़फ़्फर हुसैन बैग ने उनके वालिद और पूर्व मुख्यमंत्री फारूख़ अब्दुल्ला को नहीं बख़्शा और सेक्स स्कैंडल में दोनो का नाम घसीट दिया...बस फिर क्या था मुख्यमंत्री को ग़ुस्सा आ गया और उन्होने इस्तीफ़े का एलान कर दिया...और उस एलान के बाद विधानसभा में जो नज़ारा देखने को मिला क्या ऐसी होती है विधानसभा... और ये सियासी हंगामा अगले दिन भी चला बहरहाल मुख्यमंत्री अपना कार्य संभाल चुके हैं...
सवाल ये है कि आखिर हमारे सियासतदां चाहते क्या है और ये सब करके वो क्या बताना चाहते हैं हमें, क्यूंकि हमने ही उन्हें चुनकर वहां भेजा है...ये नज़ारा सिर्फ कश्मीर का ही नहीं है उत्तरप्रदेश में तो कईं सालो पहले विधानसभा में जो हुआ उसे कहने के लिए तो लफ़्ज़ भी नहीं मिल रहे कि किस तरह से जनप्रतिनिधि वहां एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे हो गए थे...और आज भी वहां नज़ारा कुछ अलग नहीं है....बिहार हो...मध्यप्रदेश...छत्तीसगढ़...उड़ीसा...झारखंड या फिर देश की कोई भी विधानसभा नज़ारा यही देखने को मिलेगा...विधानसभा क्या लोकसभा में भी यही सब कुछ दिख रहा है...और दिखे भी क्यों ना क्यूंकि हमारे देश के हर हिस्से से हमने चुनकर एक सांसद लेकसभा में भेजा है जो संसद में मौजूद है इसलिए कि हमारी समस्या हमारी आवाज़ को वो उस जगह पहुंचा सके...लेकिन संसद में जो कुछ हो रहा है वो किसी से छिपा नहीं है... वहां भी हंगामा ही हो रहा है...कभी किसी मुद्दे पर तो कभी किसी मुद्दे पर...लेकिन ये हंगामा क्यों बरपा हुआ है...
जहां भी जाओ जिधर भी देखो सिर्फ और सिर्फ हंगामा...सवाल ये है कि, क्या इसिलिए इन्हें हम चुनते है...? क्या यही सब हम देखना चाहते हैं...? क्या इसी तरह से ये हमारी परेशानी को ख़त्म कर देंगे...? क्या विपक्ष सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध कर रहा है...? और अगर हां तो ये कब तक चलता रहेगा...? क्या सिर्फ हंगामा खड़ा करने से तस्वीर बदल जाएगी...? या इनमें से कोई है जो ये सूरत बदलेगा...

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

कब मिलेगा सम्मान...?

कब मिलेगा सम्मान...
एक बार फिर से हुआ है हॉकी का अपमान...ताक पर रखा गया खिलाड़ियों का सम्मान...लुट गया खिलाडियों का स्वाभिमान...आख़िर कब तक होता रहेगा खिलाड़ियों का अपमान...कब तक लुटती रहेगी यूं ही चैंपियन्स की शान...और कब लौटेगा खिलाड़ियों का सम्मान..ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब का इंतज़ार हम सभी कर रहे है ख़ासकर वो जिन्हे अपने देश से अपने राष्ट्र से प्यार है...हम बात कर रहें है भारतीय हॉकी खिलाड़ियों के साथ बार बार हो रहे अपमान की... हॉकी टीम के साथ इन दिनो जो घट रहा है उसे किसी भी लिहाज़ से सही नहीं कहा जा सकता, चाहे वो पुरुष हॉकी खिलाड़ी हो या फिर महिला....देश के राष्ट्रीय खेल और खिलाड़ियों के साथ जो कुछ भी हो रहा है उसे क्या समझा जाए, ये आज की बात नहीं है कि हॉकी खिलाड़ियों के साथ इस तरह का बर्ताव किया जा रहा है आखिर कब मिलेगा सम्मान...? कब तक अपमान का घूंट पाकर ताज जीतते रहेंगे खिलाड़ी...आज हर हॉकी खिलाड़ी यही सवाल पूछ रहा है...महिला हॉकी टीम के साथ कुछ दिन पहले जो कुछ हुआ उसे सभी ने देखा और अब ऐसा ही वाकया हुआ है भारतीय पुरुष हॉकी टीम के साथ... यूरोप टूर के लिए अभ्यास में जुटी भारतीय हॉकी टीम को देश से रवाना होना था जिसके लिए उन्हे पुणे से दिल्ली जाना था लेकिन खिलाड़ियों को लाने के लिए बस ही नहीं पहुंची...
सबसे बड़ा सवाल आखिर कब मिलेगा सम्मान भारतीय हॉकी को और हॉकी खिलाड़ियों को...कभी भारतीय महिला हॉकी टीम के पास ट्रांजिट वीज़ा नहीं होता, और उन्हें एयरपोर्ट से वापस लौटना पड़ता है...जब उनसे बात होती है तब खिलाड़ी ये कहते है कि इससे हमारे मनोबल पर कोई फर्क़ नहीं पडेगा...और हमारी खिलाड़ी वाक़ई में क़ाबिले तारीफ़ है रशिया में जाकर चैंपियंस चैलेंज ट्रॉफी जीतकर लौटती है... लेकिन अफसोस है कि जब वो जीतकर वापस लौटती हैं तब उन्हें कोई लेने नहीं जाता...और सभी खिलाड़ी टैक्सी और ऑटो करके ख़ुद ही रवाना होती है...और एक बार फिर वही हुआ...अपमान, लगातार या बार-बार जो कुछ हॉकी खिलाड़ियों के साथ बर्ताव किया जा रहा है...अब ऐसे में ये उम्मीद कैसे लगाई जाए कि भारतीय हॉकी पुराने रुतबे को हासिल कर लेगी...
आखिर अपमान की ये आंधी कब तक चलती रहेगी और ऐसा कब तक होता रहेगा, क्या कोई है जो हॉकी को इंसाफ दिलाने के लिएआवाज़ उठाए, हॉकी का ये हश्र और क्रिकेट पर पैसे की बरसात, दो खेल जिन्हें खेलते तो खिलाड़ी ही है लेकिन इन खिलाड़ियों की तक़दीर बिल्कुल अलग है जो क्रिकेट खेलते हैं उन्हें मिलती है इज़्ज़त...दौलत...शोहरत और जो हॉकी खेलते हैं उन्हें मिलती है ज़िल्लत...मुफ़लिसी... और अपमान....आखिर कब मिलेगा इन खिलाड़ियों को सम्मान...लेकिन उम्मीद यही है कि ये सब कुछ होने पर खिलाड़ियों के मनोबल पर कोई फर्क ना पड़े...जैसा प्रदर्शन महिला टीम ने किया था वैसा ही प्रदर्शन पुरुष टीम भी करे...यही दुआ है...
सिर्फ हॉकी ही नहीं बल्कि दूसरे खेल के खिलाड़ी भी इसी तरह की ज़िल्लत उठाने को मजबूर है सुशील कुमार का नाम आपको याद होगा जिन्होने ओलंपिक में देश के लिए कांस्य पदक जीता था, कुछ दिनो पहले जब वो जर्मनी से कुश्ती ग्रांपी में स्वर्ण पदक जीतकर लौटे तब होना ये था कि कोई अधिकारी उन्हें लेने जाते लेकिन किस्मत देखिए यहां भी एयरपोर्ट कोई नहीं गया और वो ख़ुद ही घर की तरफ़ चल दिए...रेणु गोरा का मामला हाल फिलहाल मीडिया में नया है बॉक्सिंग फेडरेशन ने जांच की बात कही है लेकिन जांच होती है या नहीं और अगर होती है तब किस तरह की कार्रवाई होती है येदेखना होगा...बहरहाल एक बार फिर खिलाड़ियों का अपमान होने पर सवाल उठने लगे है सवाल उठने लगे है अधिकारियों पर... सवाल उठने लगे हैं कार्यप्रणाली पर...सवाल ये भी है कि जिस खेल को सरकार ना पैसा दे पा रही है और ना सुविधाएं और ना कप जीतकर लौटने पर उनका स्वागत कर पा रही है, ऐसे में क्या उम्मीद की जाए...क्या राष्ट्रीय खेल का अपमान देश का अपमान नहीं है...? जो अंधेरा इस वक्त हॉकी पर छा रहा है...जो ग्रहण लगा है उस अंधेरे... उस स्याह रात की सुबह कभी होगी....?

शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

लोकतंत्र और नक्सलवाद

लोकतंत्र और नक्सलवाद….
दो अलग और बहुत ही ज़्यादा जुदा लफ़्ज़...
लोकतंत्र, अभी हाल ही में चुनाव ख़त्म हुए है और नई सरकार बन गई है और सरकार ने अपने सौ दिनी एजेंडे पर काम करना शुरु कर दिया है...बहरहाल हम बात कर रहें है लोकतंत्र और नकस्लवाद पर...छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव ज़िले में मानपुर से थोड़ी दूर मदनवाड़ा जहां नक्सलियों ने खेला ख़ूनी खेल...छत्तीसगढ़ में एक ही दिन में इतना बड़ा हमला हुआ कि छत्तीस जवान शहीद हो गए...और कुछ जवानो के लापता होने की बात भी कही जा रही है...सवाल ये है कि कब तक इस तरह से नक्सली हमले होते रहेंगे...कब तक हम यू हीं अपने जवानो की बलि चढ़ाते रहेंगे...कब तक नक्सलियों का ये तांडव जारी रहेगा...कब तक हम अपनी ज़िम्मेदारी से मुंह फेरते रहेंगे...कब तक मासूम जाने जाती रहेंगी...कब तक हम एक दूसरे पर आरोप लगाते रहेंगे...कब तक हम मासूमों कि मौत पर राजनीति करते रहेंगे...आख़िर कब तक....?
ये एक बहुत बड़ा सवाल है लेकिन इसका जवाब कौन देगा...और क्या इसका जवाब किसी के पास है...या ये सवाल भी और सवालों की तरह ही जवाब तलाशते हुए खुद कहीं खो जाएगा...
लेकिन उम्मीद क्योंकि उम्मीद पर ही दुनिया कायम है...यहां पर हम इसलिए कहा...क्योंकि मैं से मिलकर हम बना है और हमसे मिलकर समाज...कोई तो हो जो इस आवाज़ को बुलंद करे... कोई तो हो जो ऐसे राजनेताओं को ना चुने जो मासूमों की मौत पर...शहीदों की मौत पर राजनीति करते हों...जो ऐसे अफसरो को अपनी कुर्सी से उतार फेंके जो जवानो की जान से ज़्यादा साहित्य-सृजन और काव्य गोष्ठी को तरजीह दे...या फिर राज्य के उंचे पद पर आसीन उस व्यक्ति को सच्चाई का आईना दिखाए जो कि राज्य और केंद्र के बीच इस नक्सली समस्या को ज़्यादा संजीदगी से लेने की बात तो करते हों, आर-पार की लड़ाई लड़ने की बात भी करते हों लेकिन आरपार की लड़ाई कौन लड़ रहा है ये सबके सामने है...क्या इतनी बड़ी समस्या यूं ही बातों में, आरोपों में, राजनीति में, कोरे काग़जों को स्याही दिखाकर, बंद करवाकर, मौन रखकर, काव्य-गोष्ठी आयोजित करवाकर या बाकि के तमाम काम वो जो फालतू है, बेमानी है, या यूं कहें कि महज़ इन सबको ढ़कते है...ढ़कते नहीं बल्कि इस समस्या को पीठ दिखाते हैं...क्या इनसे क्या इन सब बातों को करके हम इस सबसे बड़ी समस्या से निजात पा सकते है...छुटकारा पा सकते हैं... नहीं कभी नहीं....
क्योंकि जब तक तक हम में से कोई आवाज़ नहीं उठाएगा...तब तक शायद ही कुछ हो...तब शायद इन सब सवालों का जवाब हमारे पास हो...तब हम ये कह सके हां हम ही है...हम ही हैं जो लोकतंत्र के रक्षक है, हम ही हैं जो लोकतंत्र को जिंदा किए हुए हैं, हम ही हैं जो अच्छे और बुरे में फर्क समझते हैं, हम इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का अंग है इसका हिस्सा है...हां हम लोकतंत्र की आवाज़ है...

रविवार, 5 जुलाई 2009

मनमोहन….. मंदी.....मंहगाई....

महासमर 2009 में जनता ने अपना फैसला सुनाया...नया जनादेश दिया गया यूपीए को...काग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है...खैर नई संसद, नया चेहरा, या ये कह सकते है कि एक नई उम्मीद...डा. मनमोहन सिंह के शपथ लेने के साथ ही एक नया मिशन शुरु हो गया...मिशन मनमोहन...मंदी...मंहगाई, देखना ये होगा कि एक म बाकी के दो म पर भारी कैसे पड़ता है और उससे भी बड़ा सवाल ये कि कब....कब इस मंदी से निजात मिलती है....कब मंहगाई से छुटकारा मिलता है...मंदी के इस दौर में ये नहीं कह सकते कि भारत इससे अछूता है...फर्क हमारी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है...ड़ा. मनमोहन सिंह को भारत में आर्थिक सुधारों का जनक कहा जाता है और इस वक्त केंद्र में सबसे बड़े शीर्ष पर अगर हिंदुस्तान के आर्थिक सुधारों के जनक है तो उनका साथ देने के लिए पी. चिदंबरम और मोंटेक सिंह अहलूवालिया के साथ सी रंगराजन... ये वो चेहरे हैं जिन पर पूरा देश इस वक्त टकटकी लगाए देख रहा है... इस नई सरकार के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती है और इस चुनौती को अगर वो एक मिशन के रुप में लेती है....तो पहले सौ दिन में वो क्या कर पाएगी और किस तरह से वो अपनी रणनीति बनाएगी...ये देखने लायक होगा....बहरहाल एक और शख़्स जो पहले भी वित्तमंत्री की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी निभा चुके है एक बार फिर संसद के पटल और एक अरब से ज़्यादा लोगों के सामने बजट पेश करेंगे...लेकिन इस बार पहले की तुलना में बहुत ज़्यादा फर्क होगा क्योंकि इस बार मंदी के हालात में जबकि मंहगाई दर निगेटिव में है बजट को पेश करना है...हर तबका, हर वर्ग, हर हिंदुस्तानी इस वक्त प्रणब दा की तरफ उम्मीद भरी नज़रों से देख रहा है उद्योगपति, व्यापारी, नौकरीपेशा, मज़दूर, किसान, उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग या फिर ग़रीब... उम्मीद एक ऐसा शब्द जो सभी को कहीं ना कहीं किसी ना किसी से होती है और कहते हैं कि उम्मीद पर दुनिया क़ायम है अब जबकि नई सरकार का पहला आम बजट आने वाला है तो उम्मीद यही है कि सभी की उम्मीद पूरी हो, हर वर्ग को कुछ नहीं बहुत कुछ मिले और इस उम्मीद का इंतज़ार ना जाने कब ख़त्म होगा

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

ममता बनर्जी ने आख़िरकार रेल बजट पेश कर दिया... उम्मीदों की रेल, दीदी का बजट, ममता की छुकछुक, दीदी की रेल और ना जाने क्या-क्या नाम से सभी ने सभी यानि की मीडिया चाहे वो प्रिंट से हो या इलेक्ट्रॉनिक कई तरह के कार्यक्रम चलाए गए, लालू प्रसाद यादव से तुलना भी की गई...उम्मीदें... अपेक्षाएं...ख़्वाहिशें...सपने वो सपने जो लोगों ने देखे और वो सपने जो उन्हें दिखाए गए...उद्योगपति, सियासतदां और आम आदमी सभी की आस लगी हुई थी कि इस मंदी के दौर में ममता किस तरह से अपनी 'ममता' दिखाएंगी... आख़िरकार वो दिन आ ही गया 3 जुलाई 2009 जब ममता बनर्जी अपनी मारूति ज़ेन में बैठकर झोला टांगे संसद पहुंची, सादगी और पुराने विचारों के लिए जाने, जाने वाली रेल मंत्री ने बड़ी ही सहजता और सधी शुरुआत के साथ अपना बजट भाषण शुरु किया, बहरहाल बजट तो पेश कर दिया गया और किस तरह से सादे अंदाज़ में संसद पहुंचने वाली ममता बनर्जी ने रेल्वे के आधुनिकीकरण और आम लोगों को जो कुछ भी देने का एलान किया उसके बाद ग़म तो कहीं नज़र फिलहाल नहीं आ रहा है हां प्रतिक्रियाएं अब सामने आना शुरू होगी, ज़ाहिर सी बात है जब क्रिया होती है तो प्रतिक्रिया होगी ही...सबसे पहले प्रतिक्रिया आई पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव की, लालू ने कहा कि ममता कुंठा से ग्रसित है, बिहार की अनदेखी की गई है, और ये भी कि ममता के इस बजट से रेल को कोई फ़ायदा नहीं होले वाला... ख़ैर बजट आ गया है किसको क्या मिला...? किसको क्या नहीं मिला...? इस पर अब एक बार फिर से बहस ज़रूर होगी क्योंकि हमारे देश में कोई भी 'बात' बिना 'बात' के नहीं कही जाती, यही 'हिंदुस्तान' है और बजट भी 'राजनीति' की छांया से बच जाए ऐसा मुमकिन नहीं... और आने वाले बजट तक ये सब चलता रहेगा बहरहाल मंदी के इस मौसम में मीडिया को भी कुछ तो नहीं, हां बहुत कुछ मिल गया है...